निरंजन डी. गुलाटी लिखते है, अपने सेवाकाल के अंतिम दिन 28 फरवरी 1961 को जब मैं प्रधानमंत्री से मिलने गया तो दुःखी मन से उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने आशा की थी कि इस संधि से अन्य समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त होगा लेकिन हम वहीं हैं, जहां थे। गुलाटी मानते हैं कि उनके यह कहने से उन्हें सांत्वना नहीं मिली होगी कि संधि वार्ता के अंतिम दिनों में कुछ बातों पर हमारी बात पर जिस तरीके और प्रचण्डता से पाकिस्तान ने प्रतिक्रिया जताई थी, उससे ऐसी कोई आशा नहीं होनी चाहिये थी। साथ ही सन् 1960 में अयूब खान द्वारा द्वारा कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणियां भी ऐसी कोई आशा नहीं जगाती थी। फिर भी यइ दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस संधि से कोई मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक लाभ, जो पंडित नेहरू और कई अन्य शुभचिन्तक अपेक्षा कर रहे थे, नहीं निकले। नेहरू की निराशा विशेष रूप से गहरी थी और यह कहना गलत न होगा कि सिन्धु जल संधि हो जाने के बावजूद पाकिस्तान के साथ अन्य लम्बित समस्याओं व विवादों पर सहमति न बन पाने का नेहरू पर घातक प्रभाव पड़ा और यह उनके अंत की शुरूआत मानी जा सकती है।
लेखक परिचय-
रघु यादव एक सिविल इंजीनियर और पूर्व विधायक रहे है। इन्हें जलयुद्घ के नायक के रूप में पहचान मिली। जलयुद्घ नायक के रूप में विख्यात रघु यादव अपने पुनर्जन्म को सिन्धु थाले में सूखे व सेम की समस्या से त्रस्त लोगों की सेवा का अवसर मानकर सिन्धु-नदी-जल के कुप्रबंधन के विरूद्घ जन-जागरण के अभियान में जी-जान से जुटे हैं।
समस्या की जड़ तक पहुंचने की उनकी जिज्ञासान लिपिबद्घ कराया है- सप्तसिन्धु का भूगोल, सिन्धु थाले में सिंचाई का इतिहास, सिन्धु-जल-सन्धि का विश्लेषण और सिन्धु थाले में नदी जल के अन्तर्राज्यीय विवाद। सिन्धु थाले में नदी जल को लेकर चल रहे विवादों को सही परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने के इच्छुक लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी है।







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