लेखक पत्रकार यशवंत व्यास की किताब “बेगमपुल से दरियागंज” उन पाठकों के लिए है जो कभी पागलों की तरह स्कूली किताबों में छुपाकर लुगदी कागज़ों के उस तिलिस्म में क़ैद हो जाया करते थे और उनके लिए भी जो ये जानना चाहेंगे कि आखिर उस तिलिस्म को रचा कैसे गया था ?
गुलज़ार की ‘अंगूर’ में ट्रेन से सफर करते, टॉयलेट के हिलते दरवाजे को पिस्तौल दिखाने वाले अशोक उर्फ संजीवकुमार की जान जिस उपन्यास में अटकी रहती थी, वह था वेद प्रकाश कांबोज का ‘अज्ञात अपराधी’। हसीन दिलरुबा में दिनेश पंडित का ‘डकैती साथ लाख’ की हो या मिर्ज़ापुर में सुरेंद्रमोहन पाठक का ‘धब्बा’, पल्प उपन्यासों का एक ऐसा चुम्बकीय क्षेत्र था जिसमें उतरने के बाद कोई ताकत उसका तिलिस्म नहीं तोड़ पाई।
दिलचस्प किस्से, हैरान कर देने वाले उल्लेख, गहरे विश्लेषण और पल्प की दुनिया से जुड़े लोगों से सीधी मुलाकातें इस किताब को बनारस से इलाहाबाद और दिल्ली से मेरठ तक फैली एक ऐसी दुनिया का पठनीय दस्तावेज बनाते हैं जहाँ सस्ते कागज़ों पर पूरे दौर की धड़कन लिखी जा रही थी।
ये उपन्यास कैसे लिखे जाते थे, कौन लिखता था, कैसे छपते थे और कैसे रेलवे स्टेशन की बुकस्टालों, फुटपाथ के खोकों और किराए पर किताबें देने वालों की चलित लाइब्रेरियों तक जा पहुंचते थे जहां लोग अपने प्रिय नायकों के कारनामों या रहस्यमय कथानकों के रोमांच की खुराक लेने टूटकर जमा होते थे।





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